Monday, April 12, 2010

शाम के साए में

डूबता है जंगलों के पार

जब सूरज

तो दरख्तों की फुन्गियों पर

मचलती हैं तितलियाँ ;

भागती हैं रौशनी के

आख़िरी कतरनों को पकड़ने ।

दूर मंदिर के गुम्बज पर लगे

पीतल के कलश से टकराकर

रौशनी का वो आखिरी कतरा

अँधेरे को एक गुबार दे जाता है ।

तालाब के शांत पानी पर झलकते

खजूर के पेड़ों के प्रतिबिम्ब

इन्ही अंधेरों में खोने से लगते हैं ;

और घोंसलों में लौटते परिंदे

खामोश होकर सोने लगे हैं ।

तभी हम लौट पड़ते हैं

चौक चट्टान के उस पत्थर से विदा लेकर

जहाँ न जाने कब से बैठ कर

देखा है मैंने शाम को बिखरते हुए।

पुराना शज़र

हवा के झोंके से

वो आखरी पत्ता भी हिला

और टूट कर गिर पड़ा ;

न जाने क्यूँ

डालियों ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की ।

पुराने शज़र ने

मौसम का चादर थामा

और कातर निगाहों से देखा उसे,

जैसे कह रहा हो

अपने दामन से इक कतरा रंग तो

देता जा मेरी इन बांहों को ।

बगरना वो इन्हें काट ले जायेंगे

सूखी लकड़ियाँ समझकर।

मौसम हंसा

और हंसकर बोला

मैं रंग नहीं बांटता ,

सिर्फ इस गलियारे से गुजरता हूँ,

लोग मेरे दामन से लूट लेते हैं रंग

अपने गुलशन में सजाने के लिए

गर दम है तो तू भी आ,

चुन ले वो सारे रंग ,

अपनी बांहों में भी पत्तियां सजाले।

पुराना शजर हंसा

और अपने साये में उगते

छोटे छोटे पौधों को देखकर खुश हुआ

फिर मौसम की तरफ रुख कर बोला ,

जा चला जा राह अपने ऐ फिजां

देख तो ये हो रहा क्या साये में मेरे

पत्तियां ही पत्तियां बिछती रहीं हैं

जबसे मेरे बीज धरती पर गिरे हैं।

गम नहीं मुझको गुजर जाने का ऐ मौसम

जब कभी भी तू इधर से जा रहा होगा ,

देखना फिर इन लहकते जंगलों के रंग

मानना के फिर उगे हैं हम हमेशा की तरह

जानना उगते रहेंगे हम हमेशा की तरह।