Monday, April 12, 2010

शाम के साए में

डूबता है जंगलों के पार

जब सूरज

तो दरख्तों की फुन्गियों पर

मचलती हैं तितलियाँ ;

भागती हैं रौशनी के

आख़िरी कतरनों को पकड़ने ।

दूर मंदिर के गुम्बज पर लगे

पीतल के कलश से टकराकर

रौशनी का वो आखिरी कतरा

अँधेरे को एक गुबार दे जाता है ।

तालाब के शांत पानी पर झलकते

खजूर के पेड़ों के प्रतिबिम्ब

इन्ही अंधेरों में खोने से लगते हैं ;

और घोंसलों में लौटते परिंदे

खामोश होकर सोने लगे हैं ।

तभी हम लौट पड़ते हैं

चौक चट्टान के उस पत्थर से विदा लेकर

जहाँ न जाने कब से बैठ कर

देखा है मैंने शाम को बिखरते हुए।

1 comment:

  1. डूबते सूरज के साथ कई शामें और ऐसे ही कई बिंब देखे हैं बारहा। मुंबई में बिताई ये शाम फिर से सजीव हो उठती है। ढलता सूरज ,खज़ूर के पेड़ और गहराता अँधेरा में डूबती शाम..

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