Monday, April 12, 2010

पुराना शज़र

हवा के झोंके से

वो आखरी पत्ता भी हिला

और टूट कर गिर पड़ा ;

न जाने क्यूँ

डालियों ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की ।

पुराने शज़र ने

मौसम का चादर थामा

और कातर निगाहों से देखा उसे,

जैसे कह रहा हो

अपने दामन से इक कतरा रंग तो

देता जा मेरी इन बांहों को ।

बगरना वो इन्हें काट ले जायेंगे

सूखी लकड़ियाँ समझकर।

मौसम हंसा

और हंसकर बोला

मैं रंग नहीं बांटता ,

सिर्फ इस गलियारे से गुजरता हूँ,

लोग मेरे दामन से लूट लेते हैं रंग

अपने गुलशन में सजाने के लिए

गर दम है तो तू भी आ,

चुन ले वो सारे रंग ,

अपनी बांहों में भी पत्तियां सजाले।

पुराना शजर हंसा

और अपने साये में उगते

छोटे छोटे पौधों को देखकर खुश हुआ

फिर मौसम की तरफ रुख कर बोला ,

जा चला जा राह अपने ऐ फिजां

देख तो ये हो रहा क्या साये में मेरे

पत्तियां ही पत्तियां बिछती रहीं हैं

जबसे मेरे बीज धरती पर गिरे हैं।

गम नहीं मुझको गुजर जाने का ऐ मौसम

जब कभी भी तू इधर से जा रहा होगा ,

देखना फिर इन लहकते जंगलों के रंग

मानना के फिर उगे हैं हम हमेशा की तरह

जानना उगते रहेंगे हम हमेशा की तरह।

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