शाम ढले और क्षितिज के पीछे
सूरज जब छिप जाये ,
काले काले बादल भी जब रात के संग गहराए ;
तारों की झिलमिल टोली जब कहीं नजर न आये ,
जंगल की बांहों में अपना पगडण्डी खो जाये।
फिर भी चलते रहना है जीवन में शीश उठाकर,
हँसते ही रहना है अपने मन का दर्द छुपाकर.
जीवन की ये चलती गाड़ी
साथ साथ चलना है
अपने अपने क्षितिज पहुँच
हर सूरज को ढलना है ।
मगर यहाँ सूरज ने है क्या
कभी अँधेरा देखा,
ढल तो गया इस पार
मगर उस पार उजाला फेंका।
तुम भी हो एक सूरज
जिसको कभी नहीं ढलना है ,
जब तक साथ चलें हम सारे
तुमको भी चलना है।


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