बाबूजी (उनकी पुण्य तिथि के सातवें वर्षगांठ पर)
जब भी बाबूजी कहते
बड़ा होकर कुछ कर दिखाना
मैं सोचता था क्या होता है बड़ा होना
और कुछ कर दिखाना ।
जनता था
के जिस दिन मैं बड़ा हो गया ,
बाबूजी वो नहीं रह जायेंगे ।
उनकी झुर्रीदार चेहरे पआर
वो तैश न होगा ,
और न ही होगा उनके अन्दर
एक गहरा सा विश्वास ,
अपने मजबूत कन्धों का ,
के जिसपर बताये बगैर ही चढ़ जाता था मैं
और टस से मस न होता था उनका व्यक्तित्व ।
फिर मैं अपने बड़प्पन का क्या करूँगा
और किसे कर दिखाऊंगा कुछ
जबकि उनकी आँखों में
मुझे देखने का भी दम न होगा ।
शायद इसलिए न कुछ बना
न कुछ कर दिखाया
की बाबूजी वो ही रहें ।
मगर जब से मैंने उन्हें
सीढियों में हांफते देखा है ,
और उनकी उँगलियों को
अपने चेहरे पर कांपते देखा है
बड़ा न होकर भी
कुछ कर दिखने को दिल मचला है ,
एक वादा है
के उन्हें देर तक रुकना होगा।
('दरीचे ' से)
Wednesday, September 7, 2011
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