Monday, September 3, 2012

आदमी की भीड़ है पर खो गया है आदमी
आदमीयत ताक पर रख सो गया है आदमी।

कब से फसलें काटते थे अमन चैन -ओ प्यार का
जहर के कुछ बीज उनमे बो गया है आदमी।

आंसुओं को पोंछकर हमने बने सरहदें
लड़ते लड़ते सरहदों पर स गया है आदमी।

आसमां वाले बहुत खुश थे बनाया आदमी
फिर उसी शैतान सा क्यों हो गया है आदमी।

सोचता होगा वो ऊपर बैठकर हर दिन यही
क्या बनाया था मगर क्या हो गया है आदमी।

1 comment:

  1. वाह ,कितनी खूबसूरती से सच को बताया है !!

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