मेरा रिशु
मुझे मालूम है तुम सोचते होगे मेरे बारे ,
कहीं पर बैठकर जब याद करते होगे वो हर दिन,
सुबह से शाम तक जब तेरा मेरा संग होता था ;
कहीं कुछ हो न हो
पर अपना सा एक रंग होता था।
बहुत ही रंज होता था
चला जाता था जब बाहर ,
सरे बाज़ार की गलियों में
हरदम ढूंढता था मैं,
तुम्हारा खिलखिलाता और वो हँसता हुआ चेहरा।
अभी भी सामने है मेरे वो हँसता हुआ चेहरा।
मेरे आने तलक तुम खुद को यूँ ही खुशनुमा रखना।
क्षितिज के पार जब भी देखना
तो सोचना कि मैं
चला ही आऊंगा
जैसे चला आता था मैं हरदम।
बजे घंटी तो झट से खोलना तुम घर का दरवाजा,
बड़े दिन बाद फिर देखूंगा
वो हँसता हुआ चेहरा।


No comments:
Post a Comment