Monday, September 3, 2012

हवाओं का रुख कभी इस तरफ भी होगा 
तो बहेगी खुशबू  उन गलियों की 
जहाँ से चली उनके यादों की महफ़िल 
जो आँखों से ओझल हुआ चाहतीं हैं 

वो हर एक शाम याद आते हैं मुझको 
न जाने कहाँ तक जलेंगे यहाँ पर 
कोई और शायद कहीं बैठकर  के 
हमें याद भी यूँ ही करता तो होगा 

अकेले में खुद से जभी मिलता हूँ मैं 
तो यादों के गहरे समंदर के नीचे 
कोई झांकता है न जाने कहीं से 
अचानक भंवर में मुट्ठियों को भींचे .

कभी मुझको ऐसा गुमां होता है कि 
वो शायद मुझे अब भी पहचानता है 
कहीं न कहीं मैंने देखा है उसको 
वो सब जानता है वो सब जानता है।
 

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