हवाओं का रुख कभी इस तरफ भी होगा
तो बहेगी खुशबू उन गलियों की
जहाँ से चली उनके यादों की महफ़िल
जो आँखों से ओझल हुआ चाहतीं हैं
वो हर एक शाम याद आते हैं मुझको
न जाने कहाँ तक जलेंगे यहाँ पर
कोई और शायद कहीं बैठकर के
हमें याद भी यूँ ही करता तो होगा
अकेले में खुद से जभी मिलता हूँ मैं
तो यादों के गहरे समंदर के नीचे
कोई झांकता है न जाने कहीं से
अचानक भंवर में मुट्ठियों को भींचे .
कभी मुझको ऐसा गुमां होता है कि
वो शायद मुझे अब भी पहचानता है
कहीं न कहीं मैंने देखा है उसको
वो सब जानता है वो सब जानता है।


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