Wednesday, September 7, 2011
जब भी बाबूजी कहते
बड़ा होकर कुछ कर दिखाना
मैं सोचता था क्या होता है बड़ा होना
और कुछ कर दिखाना ।
जनता था
के जिस दिन मैं बड़ा हो गया ,
बाबूजी वो नहीं रह जायेंगे ।
उनकी झुर्रीदार चेहरे पआर
वो तैश न होगा ,
और न ही होगा उनके अन्दर
एक गहरा सा विश्वास ,
अपने मजबूत कन्धों का ,
के जिसपर बताये बगैर ही चढ़ जाता था मैं
और टस से मस न होता था उनका व्यक्तित्व ।
फिर मैं अपने बड़प्पन का क्या करूँगा
और किसे कर दिखाऊंगा कुछ
जबकि उनकी आँखों में
मुझे देखने का भी दम न होगा ।
शायद इसलिए न कुछ बना
न कुछ कर दिखाया
की बाबूजी वो ही रहें ।
मगर जब से मैंने उन्हें
सीढियों में हांफते देखा है ,
और उनकी उँगलियों को
अपने चेहरे पर कांपते देखा है
बड़ा न होकर भी
कुछ कर दिखने को दिल मचला है ,
एक वादा है
के उन्हें देर तक रुकना होगा।
('दरीचे ' से)
Wednesday, July 6, 2011
शाम ढले और क्षितिज के पीछे
सूरज जब छिप जाये ,
काले काले बादल भी जब रात के संग गहराए ;
तारों की झिलमिल टोली जब कहीं नजर न आये ,
जंगल की बांहों में अपना पगडण्डी खो जाये।
फिर भी चलते रहना है जीवन में शीश उठाकर,
हँसते ही रहना है अपने मन का दर्द छुपाकर.
जीवन की ये चलती गाड़ी
साथ साथ चलना है
अपने अपने क्षितिज पहुँच
हर सूरज को ढलना है ।
मगर यहाँ सूरज ने है क्या
कभी अँधेरा देखा,
ढल तो गया इस पार
मगर उस पार उजाला फेंका।
तुम भी हो एक सूरज
जिसको कभी नहीं ढलना है ,
जब तक साथ चलें हम सारे
तुमको भी चलना है।
Monday, April 12, 2010
शाम के साए में
डूबता है जंगलों के पार
जब सूरज
तो दरख्तों की फुन्गियों पर
मचलती हैं तितलियाँ ;
भागती हैं रौशनी के
आख़िरी कतरनों को पकड़ने ।
दूर मंदिर के गुम्बज पर लगे
पीतल के कलश से टकराकर
रौशनी का वो आखिरी कतरा
अँधेरे को एक गुबार दे जाता है ।
तालाब के शांत पानी पर झलकते
खजूर के पेड़ों के प्रतिबिम्ब
इन्ही अंधेरों में खोने से लगते हैं ;
और घोंसलों में लौटते परिंदे
खामोश होकर सोने लगे हैं ।
तभी हम लौट पड़ते हैं
चौक चट्टान के उस पत्थर से विदा लेकर
जहाँ न जाने कब से बैठ कर
देखा है मैंने शाम को बिखरते हुए।
पुराना शज़र
हवा के झोंके से
वो आखरी पत्ता भी हिला
और टूट कर गिर पड़ा ;
न जाने क्यूँ
डालियों ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की ।
पुराने शज़र ने
मौसम का चादर थामा
और कातर निगाहों से देखा उसे,
जैसे कह रहा हो
अपने दामन से इक कतरा रंग तो
देता जा मेरी इन बांहों को ।
बगरना वो इन्हें काट ले जायेंगे
सूखी लकड़ियाँ समझकर।
मौसम हंसा
और हंसकर बोला
मैं रंग नहीं बांटता ,
सिर्फ इस गलियारे से गुजरता हूँ,
लोग मेरे दामन से लूट लेते हैं रंग
अपने गुलशन में सजाने के लिए
गर दम है तो तू भी आ,
चुन ले वो सारे रंग ,
अपनी बांहों में भी पत्तियां सजाले।
पुराना शजर हंसा
और अपने साये में उगते
छोटे छोटे पौधों को देखकर खुश हुआ
फिर मौसम की तरफ रुख कर बोला ,
जा चला जा राह अपने ऐ फिजां
देख तो ये हो रहा क्या साये में मेरे
पत्तियां ही पत्तियां बिछती रहीं हैं
जबसे मेरे बीज धरती पर गिरे हैं।
गम नहीं मुझको गुजर जाने का ऐ मौसम
जब कभी भी तू इधर से जा रहा होगा ,
देखना फिर इन लहकते जंगलों के रंग
मानना के फिर उगे हैं हम हमेशा की तरह
जानना उगते रहेंगे हम हमेशा की तरह।

